Saturday, October 11, 2014

दुखियारी अम्मा के नाम

काँच हैं तुम्हारा मन
खरौंचे, दरारें, बिखरे बिम्ब
कटें हुए, कट कर खोये हुए नुकीले कोनें
उन कोनोंके कटने से बने नए कोण, उनके कोनें
कोण और कोनों के बीच बनें अर्धगोल जैसे आकार
तुम्हारी मर्यादाओं की सीमा बयाँ करनेवाले
तुम्हारे अमर्याद अस्तित्व को
अपनी नोकोंसे सीमित करनेवाले
तुम्हारे पारदर्शी स्वयं पर
अपना खुरदुरापन बिखेरनेवाले 


दीवारोंसे, खिड़कियोंसे, आशाओंसे. अपेक्षाओंसे
भिड़ भिड़ कर जब तुम थककर बैठ जाती हो
उनकी लकीरें खून बनकर दौड़ती हैं
तुम्हारे मस्तिष्क की तरफ

गर्दसा धुआँ ढक देता हैं
प्रकाश के गुजरने की हर शक्यता को
तुम कभी लाल, कभी हरी, कभी पीली नजर आती हो
तुम कुछ देर के लिए बदल जाती हो

जब सूख जाती हो
और रंग की परतें
पपड़ियों की तरह गिरने लगती हैं
तुम्हारी अधूरी अपेक्षाएं
आँसू बनकर
आशाभरी नज़रों से
मेरी तरफ देखती हैं

मैं स्तंभित हो जाता हूँ

इसलिए नहीं के मैं तुम्हे जानता हूँ
पर इसलिए
क्योंकि ऐसा लगता हैं
के तुम नहीं जानती

क्या तुम वोही हो
जिसकी पारदर्शी आंखोंसे
मैं कभी देखा करता था?

क्या तुम वोही हो
जब तुम कहती हो
के तुमने मुझे कभी गिरने से बचाया था?
क्या मैंने तुम्हे बताया था
के मैं गिरने से बचा तो सही
पर टूटने से नहीं रुक पाया था?
दर्द सह लिया था
तुम्हीने सिखाया था.

अब काफी बदल गयी हो तुम
तुम्हारे ऊपर के रंग
गिर जरूर गए थे
निकले नहीं हैं अभी तक

बातें बड़ी तीखी करती हो
दरारों से भर गयी हो
रंग भी उतर आया हैं कई में तो
दो दरारों के बीच की जगह भी
खरोंचों से भर गयी हैं

काफी वक़्त बीत गया हैं
तुम हसती हो
पर थक गयी हो
अपने आसपास की दुनिया की
नक़ल करते करते
पास ही की एक दीवार पर
एक पुरानी खिड़की में
फिट हो गयी हो
काँच की तरह

यह दीवार भी काफी पुरानी हैं
सख्त हैं, सशक्त हैं
भिड़ने से नहीं
लड़ने से टूटेगी

मैं स्तंभित, इसे देख रहा हूँ
मेरे कुछ साथियों के साथ
तुम वही रहना मगर
जब यह दीवार गिरेगी
तो मलबे में
एक दुसरे के निशान ढूंढ लेंगे

तब ना ही तुम्हारी अपेक्षाओं को
आंसुओं का मोल होगा
और मेरे टूटने में
कोई नयी बात

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